Friday, 26 June 2020
Tuesday, 23 June 2020
Sunday, 21 June 2020
Thursday, 18 June 2020
Wednesday, 17 June 2020
मेरा आज हो तुम ही ' मेरा कल हो तुम ही
''मेरा आज हो तुम ही ' मेरा कल हो तुम ही।
उन खट्टी मिट्ठी यादों का हर पल हो तुम ही।
''मेरी
हर उम्मीद का हल हो तुम्ही।
मेरी सारी
पूजाओं का फल हो तुम्ही।
'''मेरे
नेनो की धारा का जल हो तुम्ही।
मेरे इस चंचल मन का तल हो तुम्ही।
''जिसको
मेने चाहा वो हर पल हो तुम्ही
मेरे इस जीवन का कमल हो तुम्ही।
''जिसने
कर दिया जीवन को वो सरल हो तुम्ही।
जिसके लिए करना चाहा खुद को सफल हो
तुम्ही।
**********राजेश कुमार ’’आतिश’’**********
Sunday, 14 June 2020
ना शहर हैं रोशन ना गाँव आबाद हैं।
![]() |
| यह कविता देश में फालतू की ऐप से बढती अश्लीलता और फूहड़ता के खिलाफ लिखी हैं। |
''ना शहर हैं रोशन ना गाँव आबाद हैं।
मुल्क मेरा पल पल हो रहा बर्बाद हैं
''संस्कृति ,सभ्यता लगे पिछड़ी
बात हैं।
नग्नता और फूहड़ता में आज दिन रात हैं।
''दौलत और शोहरत कमाना
अब ज़रूरी हैं।
इसलिए बेहयाई की हर गली से हो रही शुरुआत हैं।
''जब चरित्र पर भारी
पड़ती 'भौतिकता की बिसात हैं।
तब हर सच पर करता दिखें भ्रस्टाचार मात हैं।
''जब दौलत ही बन जायें
लोगो का मान हैं।
तब हर चौक पर बिकता दिखें रोज़ ईमान हैं।
**********राजेश कुमार ’’आतिश’’**********
Saturday, 13 June 2020
ख़ुशी ने भी मेरे घर आना छोड़ दिया।
''ख़ुशी ने भी मेरे घर आना छोड़ दिया।
जबसे उन्होंने मुस्कुराना छोड़ दिया।
मेरे लफ्ज़ भी वाकिफ हैं जज़्बातों से मेरे।
की उन्होंने भी अब गुन गुनाना छोड़ दिया।
''हमने भी उस गली में
जाना छोड़ दिया।
जिस गली में उसने आना छोड़ दिया।
''तोह्फ़ा दूँ तो कैसे
दूँ में उसे।
काबुल करना जो उन्होंने नज़राना छोड़ दिया।
''करके कोई उन्होंने मुझे बहाना छोड़ दिया।
कहता भी किसे जब साथ पुराना छोड़ दिया।
जो साथ नही तुम तो कुछ अच्छा रहें कैसे।
वक़्त ने भी किस्मत को मनाना छोड़ दिया।
''हमने वो गली ' वो मोहल्ला 'वो याराना छोड़ दिया।
तेरी यादों में जो गुज़रा वो ज़माना छोड़ दिया।
खुद को संभाले निकला हूँ फिर आज घर से..
नई उम्मीद ,और आस में कुछ पुराना छोड़ दिया।
**********राजेश कुमार ’’आतिश’’**********
अपनी यादो में फिर से डुबाने के लिये आ।
''अपनी यादो में फिर
से डुबाने के लिये आ।
आ मेरी बर्बादी का
मातम मनाने के लिए आ।
''हैं भीगा दामन आज अपने ही आसुँओं में।
चल फिर से मुझको
रुलाने के लिये आ।
''आ मेरे अरमानो को फिर से जलाने के लिए आ।
झूठा ही सही प्यार
जताने के लिए आ।
तू मेरा नहीं यह जनता हूँ में।
आ फिर से मुझे छोड़
जाने के लिए आ।
''आ फिर से मुझे आजमाने लिए आ।
मेरे गम को फिर से
बड़ाने के लिए आ।
''ज़ख्म ही दिए तूने सदा ही मुझको।
आ कभी मरहम भी लगाने
के लिए आ।
''चल फिर से अपनी बात मनवाने के लिए आ।
ना दी कोई सौगात फिर
फिर भी जताने के लिए आ।
''फिर कोई बहाना बनाने के लिए आ।
आ मेरी मुझसे पहचान
कराने के लिए आ।
**********राजेश कुमार ’’आतिश’’**********
Friday, 12 June 2020
दिन भी तेरे ,रातें भी तेरी।
''दिन भी तेरे ,रातें भी तेरी।
लौटा दे वो शाम का नजारा हमे।
''छोड़ गया वो मुझे
तन्हा अँधेरे में।
दिखा न फिर कभी उजियारा हमे।
''हुआ वो मुझसे दूर
मगर।
''खुद से जुदा कर ना
पाया हमे।
''ज़िन्दगी लेगी और
कितने इम्तिहान।
हर सवाल में उसने सिर्फ उलझाया हमे।
''निकल आता में हर
मुश्किल से बाहर।
गर तूने जो होता हाथ थमाया हमें।
**********राजेश कुमार ’’आतिश’’**********
Saturday, 6 June 2020
दरबारे वतन में
''दरबारे वतन में जब एक दिन सब जाने वाले जायेंगे।
कुछ अपनी सज़ा को
पहुंचेंगे ,कुछ अपनी जजा ले जायेंगे।
''ऐ ख़ाक नशीनो उठ बेठो ,वो वक़्त करीब आ पहुंचा है।
जब तख़्त गिरायें
जायेंगे। जब ताज उछाले जायेंगे
''अब टूट गिरेंगी जंजीरें ,अब जिन्दानों की खेर नहीं
जो दरिया झूम के उठे
हैं ,तिनको से ना टाले जायेंगे।
''कटते भी चलो 'बड़ते भी चलो 'बाजू भी बहुत हैं सर भी बहुत।
चलते भी चलोगे अब
डेरे 'मंजिल पे ही टाले जायेंगे
''ऐ जुल्म के मारों लैब खोलो 'चुप रहने वालो चुप कब तक।
कुछ हर्ष तो इनसे
उठेगा 'कुछ दूर तो नाले जायेंगे
''दरबारे वतन में जब एक दिन सब जाने वाले जायेंगे।
श्रेष्ठ भारत ( भारत एक खोज )
''श्रृष्टि से पहले सत्य नहीं था।
असत्य भी नहीं ' अंतरिक्ष
भी नहीं था।
छिपा था क्या , कहाँ
किसने ढका था।
''श्रृष्टि का कौन हैं
करता ,करता हैं वाहा करता।
ऊँचे
आकाश में रहता ,सदा अध्यक्ष बना रहता।
''वो ही सच में जानता ,या नहीं भी जानता
हैं
किसी को नहीं पता ,नहीं हैं पता।
नहीं
हैं पता।.........
''वो था हिरण्य गर्भ
श्रृष्टि से पहले विद्यमान।
वो ही
तो सारे भूत जात का स्वामी महान।
''जो हैं अस्तित्व मान, धरती आसमान धारण कर।
ऐसे
किसी देवता की उपासना करें ' हम हवी देकर।
''जिसके बल पर तेजोमय
हैं अम्बर।
पृथ्वी
हरी भरी स्थापित स्थिर।
''स्वर्ग और सूरज भी
स्थिर।
ऐसे
किसी देवता की उपासना करें ,करें हम हवी देकर।
''गर्भ में अपने अग्नि
' धारण कर पैदा कर।
व्यापा था जल इधर उधर निचे ऊपर।
जगा चुके वो कई का मेघा प्राण बनकर।
ऐसे किसी देवता की उपासना करें हम हवी देकर।
''ॐ श्रृष्टि निर्माता
स्वर्ग रचयिता पूर्वज रक्षा कर।
सत्य धरम पालक अतुल जल नियामक रक्षा कर।
''फेली हैं दिशायें
बाहू ,जैसी उसकी सब में सब पर।
ऐसे ही देवता की उपासना करें 'हम हवी देकर।
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जीवन की हकीकत
![]() |
| यह कविता मेने जब में स्कूल में पड़ता था 1999 में उस दौरान लिखी थी |
''जीवन हैं जैसे सूखा दीपक।
कभी यह जलता कभी यह बुझता।
कभी तो इसमें बाती होती।
कभी इसमें तेल ना होता।
''जीवन हैं जैसे फसल
किसान की लहलहाती हैं।
बाढ़ अगर आ जाए तो ,यह बह जाती हैं।
''जीवन हैं जैसे चलता
पहिया
कभी यह रुकता कभी यह चलता।
कभी तो इसमें हवा होती
कभी यह पंचर होता।
''जीवन हैं जैसे पत्थर
रस्ते का।
कभी इधर तो कभी उधर होता।
कभी तो यह महल में जड़ता।
कभी कंकड़ बन फिरता।
**********राजेश कुमार ’’आतिश’’**********
11-01-1999
Friday, 5 June 2020
Thursday, 4 June 2020
Wednesday, 3 June 2020
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