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Wednesday, 29 July 2020

याद रखना





‘’इस तंग दिल दुनिया में मुझे छोड़ के गर जाओगे। 
याद रखना एक दिन खुद को भी तनहा पाओगे।
‘’हम तेरे दिए गम की यादों में जी लेंगे।
और तुम अपनी यादो को समेटते ही रह जाओगे।

‘’कल किसी मोड़ पे गर तुम हमसे मिल जाओगे।
याद रखना हमसे तुम नज़रे न मिला पाओगे।
‘’बीता हुआ येकल फिर लौट क ना आएगा।
और अपने किये हाल पर तुम खुद ही पछताओगे।

‘’ये बातें मेरी मज़ाक में तुम आज तो उड़ाओगे।
कल याद कर के तुम रो भी ना पाओगे।
‘’जो मुस्कुरा के गम का गीत में लिख रहा हूँ आज।
कल तुम उसे रो कर भी पड़ ना पाओगे।

‘’मेरें जाने के बाद मेरें गीतों को संजोगे।
ढूंढोगे उनमे अपने निशाँ और खुद को सताओगे।
तेरी याद बन के बोल मेरे  गीतों पर सज गये।
पर उन बोलो को तुम कभी गुनगुना ना पाओगें। 


**********राजेश कुमार ’’आतिश’’**********



Friday, 24 July 2020

हर पल तेरे साथ हूँ में।



‘’अन्जान राहों में। थामोगे वो हाथ हूँ में।
तेरे दिल का हर जज़्बात हूँ में।  
‘’बुझ ना सके जो तूफानों में। कभी
बन के लौ हर पल तेरे साथ हूँ में।  

‘’भुला ना सको वो मुलाकात हूँ में।  
तेरी जुबां से निकली हर बात हूँ में।  
‘’सजायें हैं पलकों पे तूने जो मोती
तुझे दी हुई यादों की वो सौगात हूँ में।  

‘’छुपाती हो दिल में। वो राज़ हूँ में।  
पड़ती हो तुम जो वो नमाज़ हूँ में।  
‘’मांगा हैं तुमने जिसको खुदा से
तेरे दिल से निकली वो आवाज़ हूँ में।  

‘’भिगों तुम जिसमे वो बरसात हूँ में।
हो ना सुबहा जिसकी वो रात हूँ में।  
‘’पहलु में। बेठे रहों तुम जिसके 
वो हंसी खुबसूरत कायनात हूँ में।  


**********राजेश कुमार ’’आतिश’’********** 

इस मुकद्दर से ना जाने क्यों ‘अपनी नहीं यारी हैं।



‘’इस मुकद्दर से ना जाने क्यों ‘अपनी नहीं यारी हैं।
किसी के हिस्से में शोहरतें ' किसी के हिस्से में खुमारी हैं।
‘’दिल में जगाये हैं।‘चिराग हमने भी हसरतों के जहाँ में 
दर पे तेरे शायद ‘मुराद पूरी होने की अभी नहीं मेरी बारी हैं।

‘’के इस जहाँ में फ़क्त एक में ही बेकार हूँ।
या किसी और की किस्मत भी लाचारी हैं।
‘’गुनाह हो जाऐगा शायद उस रब के हाथों
गर संवर जायेगी तकदीर जो थोड़ी सी हमारी हैं।

‘’’के सितम तकदीर के अब सहे नहीं जाते
लकीरों में उलझी हुई ये ज़िन्दगी लाचारी हैं।
‘’जिसने खाए हो सितम खुद अपने ही मुकद्दर से
उसके मुकद्दर की भी शायद गम से यारी हैं।

‘’याद नहीं वो रात जो मेने हँस के गुजारी हैं।
कटती नहीं ज़िन्दगी हर पल हमपे भारी हैं।
‘’बड़ते हैं। कदम भी डर डर आगे
लगता हैं। राहों में बिछी हर कदम पे कटारी हैं।

‘’तकदीर भी हम पे कुछ ज़यादा ही वारी हैं।
करती गुन्हा खुद हैं। हिस्से में सज़ा हमारी हैं।
‘’भूल गई हैं।तकदीर खुद शायद मुस्कुराना
इसलिए देना उसका हर पल हमपे सितम ज़ारी हैं।


‘’कहते हैं। लोग मुकद्दर रब के हाथो में हैं।
क्यूँ नहीं सुनता वो जो यह कहता फरियादी हैं।
बदलेगी किसी दिन तक़दीर भी हमारी
बस यही सोच के ये ज़िन्दगी गुजारी हैं।


**********राजेश कुमार ’’आतिश’’********** 

Friday, 17 July 2020

ना जाने क्यूँ वो गुजरा ज़माना याद आता हैं।


‘’ना जाने क्यूँ वो गुजरा ज़माना याद आता हैं।
भरी महफ़िल में भी खुद को यह दिल तन्हा पाता हैं।

‘’गुज़र रही है ज़िन्दगी ‘ये मेरी कुछ इस तरहा
की अब गम नहीं ख़ुशी का डर सताता हैं।

‘’के पूछता हूँ ये अक्सर में खुद से
क्या बन गया हूँ और दिल क्या बनना चाहता हैं।

‘’हटती नहीं नज़र ‘तेरी तस्वीर से मेरी
हर नज़र में मुझे बस तू ही नज़र आता हैं।

‘’ज़िन्दगी में छा गई हैं।ख़ामोशी इस कदर
की हर आहट पर अब ज़ी घबराता हैं।


................‘’ना जाने क्यूँ वो गुजरा ज़माना याद आता हैं।

**********राजेश कुमार ’’आतिश’’********** 



Thursday, 16 July 2020

ख्हाबों खयालो में तुझको बिठाया हैं।




‘’ख्हाबों खयालो में तुझको बिठाया हैं।
हर घडी हर पल तू नज़र आया हैं।
‘’तुझे चाहने की हंसी भूल की हैं।
ज़िन्दगी का सपना तेरे संग सजाया हैं।

‘’तुझे प्यार करता हूँ कितना ‘बताऊँ क्या
मेरी ज़िन्दगी को अनमोल तूने बनाया हैं।
‘’दरबदर में फिरता रहता था ‘यहाँ
बदल गई ज़िन्दगी में ‘जबसे तू आया हैं।

‘’नज़र बंद कर के भी दिखती हैं। हर जगह
उदासी की नींद से जो तूने जगाया हैं।
‘’काँटों में उलझी हुई थी यह ज़िन्दगी
फूलो की खुशबु से तूने महकाया हैं।

‘’संवर गई हैं। दुनिया मेरी कुछ इस तरहा
नज़र लगने के डर से इसको छुपाया हैं।
‘’बस गया हैं। तेरा प्यार मेरी सांसों में
इस दिल को धडकना तूने सिखाया हैं।

‘’गिर ना जाये तेरी आँखों से आंसू कभी
इस कोशिश में ज़िन्दगी का हर पल लगाया हैं।
‘’खो गया हूँ तेरे आगोश में अब
जिस्म तेरा मुझमे सिमट के जो आया हैं।

‘’मुस्कुराती हैं। सुबहा हर रात जगमगाती हैं।
तारो की झिलमिलाहट में भी चाँद नज़र आया हैं।
‘’रोशन हो गई ज़िन्दगी अब इस तरहा
जबसे चाहत का दिया इस दिल में तुमने जलाया हैं।

‘’हो ना जाना मुझसे दूर कभी
बीन तेरे ज़िन्दगी बस एक काला साया हैं।
‘’मर जाऊँगा में उसी पल ‘अगर
कभी ‘तुझको को जुदा मेने खुद से पाया हैं।

‘’ना कर फ़िक्र इस ज़माने की
हमे तो खुद उस रब ने मिलाया हैं।
‘’क्या सोचती हैं अगले जन्म का
हमने तो हर गुज़रा जन्म साथ बिताया हैं।

**********राजेश कुमार ’’आतिश’’********** 

Saturday, 11 July 2020

एक बच्चा जो सड़क किनारे तिरंगा झंडा बेच रहा था

कविता में उस  मार्मिक दर्द  को  व्यंग रूप में चंद पंक्तियों में व्यक्त किया हैं 


एक बच्चा जो सड़क किनारे तिरंगा झंडा बेच रहा था
और आने जाने वाले हर लोगो को अपनी और खेंच रहा था
5 रूपए में झंडा लेने की आवाज़ लगा रहा था
और आती जाती गाड़ियों की तरफ दौड़ के भी जा रहा था

एक महाशय ने झंडा लिया पर 10र० के तीन देने का आग्रह किया
बच्चा बोला == बाबु साहब आप गैरत वाले नज़र आते हो 
क्यूँ देश के मान का दाम कम लगते हो
बाबु साहब इस तिरंगे पर देश का मान सम्मान टिका हैं

और कुछ ही दिन पहले 
यही झंडा नेताजी की सभा में 10 रु में एक बिका हैं
बाबु साहब बोले = बेटा इस महंगाई ने हर तरफ से मारा है
इसलिए झंडा खरीदने के लिए भी सोचता यह आम आदमी बेचारा हैं
बेटा नेताजी सो नहीं हज़ार में भी झंडा खरीद सकते हैं 
क्यों की वो हर पल हमारे टेक्स के पैसे चरते हैं
और हम अपना पसीना बहा के ज़िन्दगी गुज़र बसर करते हैं

नहीं मिलता यहाँ आम आदमी को डंडे का भी सहारा हैं
इसलिए झंडा खरीदने के लिए सोचता यह आम आदमी बेचारा हैं  

**********राजेश कुमार ’’आतिश’’**********

Tuesday, 7 July 2020

उन टूटी हुई दीवारों से।

 यह कविता समर्पित हैं कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक
जो हिन्दुओं पर अत्याचार हो रहें हैं उन सभी हिन्दुओं के
दर्द को बयाँ करती हुई है यह कविता

''उन टूटी हुई दीवारों से। 
मँदिर के खंडहर हुये गलियारों से। 
''सिर्फ चींख सुनाई देती है। 
हर दर्रे और दरारों से। 

''उन खून सनी कटारो से। 
गर्दन कटती उन तलवारों से। 
''नहीं कोई बचाने आया। 
उन दहशतगर्दी नारों से। 

''कब तक यूँही दर्द सहोगे। 
बैठें यूँ लाचारों से। 
''उठा भाला महाराणा सा। 
और लड़ इन अत्याचारों से। 

''ताक में हैं बैठा दुश्मन। 
लड़ने को हथियारों से। 
''कर दे फ़ना इन दहशतगर्दों को 
की नज़र ना आये नज़रो से। 

''हिन्दू हित की गुहार लगते। 
थक गए सब सरकारों से। 
''हिन्दू को ही बचाना हैं हिन्दू को। 
बेदखल हो जाओगे वरना अपने ही घरबारो से। 

 **********राजेश कुमार ’’आतिश’’**********

Thursday, 2 July 2020

रणछोड़दास रबारी भारतीय सेना का अनोखा सिपाही

रणछोड़ पगी की कार्यशैेली से आज की युवा पीढ़ी पूरी तरह से अनजान है।

फोटो में जो वृद्ध गड़रिया है वास्तव में ये सेना का सबसे बडे राजदार थे पूरी पोस्ट पड़ें  इनके चरणों मे आपका सर अपने आप झुक जाएगा, 2008 फील्ड मार्शल*मानेक शॉ* वेलिंगटन अस्पतालतमिलनाडु में भर्ती थे। गम्भीर अस्वस्थता तथा अर्धमूर्छा में वे एक नाम अक्सर लेते थे - *'पागी-पागी!'* डाक्टरों ने एक दिन पूछ दिया “Sir, who is this Paagi?”

सैम साहब ने खुद ही brief किया...

1971 भारत युद्ध जीत चुका थाजनरल मानेक शॉ *ढाका* में थे। आदेश दिया कि पागी को बुलवाओ, dinner आज उसके साथ करूँगा! हेलिकॉप्टर भेजा गया। हेलिकॉप्टर पर सवार होते समय पागी की एक थैली नीचे रह गईजिसे उठाने के लिए हेलिकॉप्टर वापस उतारा गया था। अधिकारियों ने नियमानुसार हेलिकॉप्टर में रखने से पहले थैली खोलकर देखी तो दंग रह गएक्योंकि उसमें दो रोटीप्याज तथा बेसन का एक पकवान (गाठिया) भर था। Dinner में एक रोटी सैम साहब ने खाई एवं दूसरी पागी ने।

*उत्तर गुजरात* के *सुईगाँव* अन्तर्राष्ट्रीय सीमा क्षेत्र की एक border post को *रणछोड़दास post* नाम दिया गया। यह पहली बार हुआ कि किसी आम आदमी के नाम पर सेना की कोई post होसाथ ही उनकी मूर्ति भी लगाई गई हो।
पागी यानी *'मार्गदर्शक'*, वो व्यक्ति जो रेगिस्तान में रास्ता दिखाए। *'रणछोड़दास रबारी'* को जनरल सैम मानिक शॉ इसी नाम से बुलाते थे।
गुजरात के *बनासकांठा* ज़िले के पाकिस्तान सीमा से सटे गाँव *पेथापुर गथड़ों* के थे रणछोड़दास। भेड़बकरी व ऊँट पालन का काम करते थे। जीवन में बदलाव तब आया जब उन्हें 58 वर्ष की आयु में बनासकांठा के पुलिस अधीक्षक *वनराज सिंह झाला* ने उन्हें पुलिस के मार्गदर्शक के रूप में रख लिया।

*हुनर इतना कि ऊँट के पैरों के निशान देखकर बता देते थे कि उस पर कितने आदमी सवार हैं। इन्सानी पैरों के निशान देखकर वज़न से लेकर उम्र तक का अन्दाज़ा लगा लेते थे। कितनी देर पहले का निशान है तथा कितनी दूर तक गया होगा सब एकदम सटीक आँकलन जैसे कोई कम्प्यूटर गणना कर रहा हो।*
1965 युद्ध की आरम्भ में पाकिस्तान सेना ने भारत के गुजरात में *कच्छ* सीमा स्थित *विधकोट* पर कब्ज़ा कर लियाइस मुठभेड़ में लगभग 100 भारतीय सैनिक हत हो गये थे तथा भारतीय सेना की एक 10000 सैनिकोंवाली टुकड़ी को तीन दिन में *छारकोट* पहुँचना आवश्यक था। तब आवश्यकता पड़ी थी पहली बार रणछोडदास पागी की! रेगिस्तानी रास्तों पर अपनी पकड़ की बदौलत उन्होंने सेना को तय समय से 12 घण्टे पहले मञ्ज़िल तक पहुँचा दिया था। सेना के मार्गदर्शन के लिए उन्हें सैम साहब ने खुद चुना था तथा सेना में एक विशेष पद सृजित किया गया था *'पागी'* अर्थात पग अथवा पैरों का जानकार।

भारतीय सीमा में छिपे 1200 पाकिस्तानी सैनिकों की location तथा अनुमानित संख्या केवल उनके पदचिह्नों से पता कर भारतीय सेना को बता दी थीतथा इतना काफ़ी था भारतीय सेना के लिए वो मोर्चा जीतने के लिए।
1971 युद्ध में सेना के मार्गदर्शन के साथ-साथ अग्रिम मोर्चे तक गोला-बारूद पहुँचवाना भी पागी के काम का हिस्सा था। *पाकिस्तान* के *पालीनगर* शहर पर जो भारतीय तिरंगा फहरा था उस जीत में पागी की भूमिका अहम थी। सैम साब ने स्वयं ₹300 का नक़द पुरस्कार अपनी जेब से दिया था।
पागी को तीन सम्मान भी मिले 65  71 युद्ध में उनके योगदान के लिए - *संग्राम पदकपुलिस पदक* व *समर सेवा पदक*!
27 जून 2008 को सैम मानिक शॉ की मृत्यु हुई तथा 2009 में पागी ने भी सेना से 'स्वैच्छिक सेवानिवृत्तिले ली। तब पागी की उम्र 108 वर्ष थी ! जी हाँआपने सही पढ़ा... 108 वर्ष की उम्र में 'स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति'

इससमय 1971 के युद्ध पर एक फिल्म बन रही है। भुज: द प्राइज ऑफ इंडियाइसमें अजय देवगन की मुख्य भूमिका है। इस फिल्म में रणछोड़ पगी की भूमिका संजय दत्त निभा रहे हैं। फिल्म में संजय दत्त का नाम रणछोड़ रबारी रखा गया है। रणछोड़ पगी का जन्म आजादी के पहले पाकिस्तान में जन्मे थे। 
सन् 2013 में 112 वर्ष की आयु में पागी का निधन हो गया।

आज भी वे गुजराती लोकगीतों का हिस्सा हैं। उनकी शौर्य गाथाएँ युगों तक गाई जाएँगी। अपनी देशभक्तिवीरताबहादुरीत्यागसमर्पण तथा शालीनता के कारण भारतीय सैन्य इतिहास में हमेशा के लिए अमर हो गए रणछोड़दास रबारी यानि हमारे 'पागी'
चित्र उन्हीं का है।



 पागी यानी *'मार्गदर्शक'*, वो व्यक्ति जो रेगिस्तान में रास्ता दिखाए। 'रणछोड़दास रबारी