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Monday, 17 August 2020

वो करती हैं। प्यार मुझसे इतना

 

“वो करती हैं। प्यार मुझसे इतना ‘क्यों मुझको मुझी से चुराती हैं।

बाँहों में मेरी भर के खुद को ‘फिर क्यों मुझसे वो शर्माती हैं।

 

‘’वो तनहा रातों में आके ‘चुपके से मुझे जगती हैं।

दिखाकर मीठा सा एक सपना ‘वो जाने कहाँ खो जाती हैं।

 

“ये पूछता हूँ में उससे अक्सर ‘इतना क्यों मुझे सताती हैं।

ख्हाबों में आके मेरे ‘क्यों इतना प्यार जताती हैं।

 

“वो करती हैं। मुझसे प्यार ‘इतना ‘तुम दूर उसे ले जाते हो।

छोटी सी हैं। चाहत हमारी ‘तुम वो भी नहीं सह पाते हो।

 

“में उसका हूँ ‘वो मेरी हैं। ‘इससे तुम इनकार क्यूँ जताते हो।

जीने मरने की हमने ली कसम ‘फिर तुम क्यों खलल जाते हो।

 

“मेरी मोहब्बत के बारे में ‘तुम क्या मुझे समझाते हो।

गर इतना समझते हो। मोहब्बत को ‘क्यों मुझसे मेरी मोहब्बत छुपाते हो।

**********राजेश कुमार ’’आतिश’’**********

Saturday, 8 August 2020

इतिहास में खोई हिन्दू शेरनी रंग कुमार

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सिखों के दसवें गुरु गोविन्द सिंह युद्धनीति में भी पारंगत थे और उनका मानना था कि कला-संस्कृति के साथ-साथ लोगों को युद्धकला का भी प्रशिक्षण मिलना चाहिए। वे खालसा के लिए ऐसे लोग चाहते थे, जो अपना जीवन क़ुर्बान करने में भी नहीं हिचकें। सिखों के पवित्र पुस्तकों में से एक दशम ग्रन्थके रचयिता भी गुरु गोविन्द सिंह को माना गया है। चरित्रोपाख्यानइसी दशम ग्रन्थ का एक भाग है, जिसमें कई ऐतिहासिक और पौराणिक कहानियाँ हैं। इन कहानियों में एक ऐसी कहानी है, जो 16वीं सदी में हिंदुस्तान पर राज़ करने वाले अकबर से जुड़ी है।

सिख ग्रन्थ श्री चरित्रोपाख्यानमें ऐसी-ऐसी कहानियाँ हैं, जिसे पढ़ने के बाद व्यक्ति दूसरों की ग़लतियों से सीख सकता है। 404 कहानियों के इस सेट की सिख धर्म में काफ़ी मान्यता है। इसमें अकबर से जुड़ी जो कहानी है उससे अकबर के ठरकपन और चरित्र के बारे में पता चलता है। अब चूँकि आपको इस बारे में न के बराबर पता होगा, हम आपके लिए इस कहानी को पेश कर रहे हैं। यह चरित्रोपाख्यानकी 185वीं कहानी है।

चरित्रोपाख्यान: अकबर और रंग कुमारी की कहानी

आगरा स्थित अकबराबाद में एक साहूकार रहा करता था। रंग कुमारी उसी की बेटी थी। कहते हैं उसका सौंदर्य ऐसा था कि जो भी एक बार देख ले मोहित हो जाता। उस समय आगरा अकबर की राजधानी थी और वह वहीं से शासन चलाया करता था। वह फतेहपुर सीकरी में अपना दरबार लगाया करता था। अकबर को शिकार का शौक था और वह अक्सर शिकार खेलने जाया करता था।

एक बार शिकार खेलने के दौरान ही अकबर की नज़र रंग कुमारी पर पड़ी और वह तुरंत ही उस पर मोहित हो गया। अकबर उसे हर हाल में पाना चाहता था। अकबर के बारे में पुस्तक लिख चुके डर्क कोलियर कहते हैं कि अकबर के महल में कम से कम 5000 महिलाएँ होती ही होती थीं। बेल्जियम के लेखक के अनुसार, अकबर अनगिनत महिलाओं के साथ सो चुका था और यह सब तभी शुरू हो गया था जब वह काफ़ी कम उम्र का था। इतिहासकारों की मानें तो अकबर की 300 के क़रीब पत्नियाँ थीं।

अकबर ने कई राजपूत राजघरानों की लड़कियों से शादी कर रखी थी। ख़ैर, वापस रंग कुमारी की कहानी पर आएँ तो अकबर ने अपनी एक दासी को उसके पास भेजा। वह दासी अकबर का सन्देश लेकर रंग कुमार के पास गई। सन्देश यही था कि अकबर ने रंग कुमारी को अपने महल में बुलाया है। रंग कुमारी चालाक महिला थीं। उन्होंने अकबर के पास जाना स्वीकार नहीं किया, लेकिन वह जानती थीं कि वह एक शक्तिशाली बादशाह है। इसीलिए, रंग कुमारी ने अकबर को अपने घर पर बुलाया।

दासी ने अकबर को जाकर रंग कुमारी का सन्देश कहा। जब अकबर रंग कुमारी के पास पहुँचा तो वह बिस्तर लगा रही थी। फिर क्या था, अकबर की ख़ुशी का ठिकाना न रहा। उसे लगा कि वह अपने उद्देश्य में सफल हो रहा है। लेकिन, रंग कुमारी भी पतिव्रता हिन्दू महिला थीं। रंग कुमारी ने अकबर को काफ़ी इज्जत दी। बिस्तर लगाने के बाद अकबर से कहा कि वह शौचालय से निपट कर आना चाहती हैं। उन्होंने कहा कि वह जल्दी ही आ जाएँगी।

 

शौचालय जाने के बहाने निकली रंगा कुमारी ने दरवाजा तेज़ी से बंद कर दिया और इस तरह से अकबर अंदर कमरे में ही क़ैद हो गया। इसके बाद कुमारी अपने पति को लेकर उस कमरे में आ गईं। अपनी पत्नी के साथ छेड़छाड़ से क्रुद्ध रंग कुमारी के पति ने गुस्से में न सिर्फ़ अकबर के ताज को ज़मीन पर पटक कर अपने पैरों तले रौंद डाला बल्कि अपना जूता निकाल कर अकबर को कई जूते लगाए भी।

बादशाह अकबर अपनी इज्जत और प्रतिष्ठा के डर से यह सब बर्दाश्त करता रहा। कहीं न कहीं उसके मन में यह एहसास भी हो गया कि उसने ग़लत किया है। लज्जा के मारे वह चुपचाप खड़ा रहा। इसके बाद रंग कुमारी और उसके पति ने मिल कर अकबर को एक भू-गर्भित कालकोठरी में क़ैद कर दिया। हिंदुस्तान का बादशाह होकर औरतों पर ग़लत नज़र डालने वाले अकबर की ये कहानी शायद ही कहीं और पढ़ी-पढ़ाई गई हो।

अगले दिन की सुबह होते ही पति-पत्नी अकबर को लेकर शहर के क़ाज़ी के पास पहुँचे। न्यायालय में रंग कुमारी और उसके पति ने अकबर के कुकृत्यों को बताने के बाद कहा, “यह एक संत है, चोर है, साहूकार है या फिर बादशाह है, आप ख़ुद पता कर लीजिए।इतना कह कर निकल गए। लज्जा के मारे अकबर का सिर ऊपर उठ ही नहीं रहा था। पूरे प्रकरण के दौरान वह सिर झुकाए खड़ा रहा।

चरित्रोपाख्यानमें पूछा गया है कि अगर कोई व्यक्ति इस तरह से पराई स्त्री पर नज़र डालता है और उसके घर में घुस जाता है, क्या उसे दण्डित नहीं किया जाना चाहिए? बादशाह अकबर को इस घटना के बाद अच्छी सीख मिली और उसके बाद उसने किसी पराई स्त्री के घर में घुसना बंद कर दिया। उपर्युक्त कहानी सिख ग्रन्थ चरित्रोपाख्यानमें वर्णित है, जिसके रचयिता गुरु गोविन्द सिंह माने गए हैं।

अब सवाल यह उठता है कि प्राचीन पुस्तकों में जब अकबर के बारे में ऐसा वर्णित है तो इस बारे में कोई चर्चा क्यों नहीं करता? अकबर महानके कथित सेक्युलर चरित्र का गुणगान करते हुए उसे भारत का नायक के रूप में पेश करने वाले वामपंथी इतिहासकारों ने अकबर के नेगेटिव पक्ष को इस तरह से छिपाया और यह कोई एक कहानी नहीं हैं ऐसी हजारों कहानियाँ हैं हिन्दू वीरों की गौरव गाथाएं हैं जिन्हें वामपंथी इतिहासकारों ने जानबूझ कर छुपाया ताकि हिन्दू हमेश एक ग्लानी और हीन भावना में ही जीते रहें उन्हें कभी अपने गौरवपूर्ण इतिहास की जानकरी ना हो

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Friday, 7 August 2020

एक दिन



‘’तुम्हारी ज़िन्दगी से हम चले जायेंगे एक दिन।
दूर तारों में कहीं खो जायेंगे एक दिन।
‘’ढूंढोगे निशाँ तुम हमारे ज़मीं पर
बस याद बन के हम रह जायेंगे एक दिन।

‘’मरने के बाद उन्हें याद आयेंगे एक दिन।
वो मिट्ठी हमारी कब्र से उठायेंगे एक दिन।
‘’पलकों पे सजा के अश्क मेरी मोहब्बत का
मेरी यादों में फिर लौट जायेगें एक दिन।

‘’बन के साज़ तेरी धड़कन में बस जायेंगे एक दिन।
दिल की वादियों में तेरी हम गूंज जायेंगे एक दिन।
‘’संभालो तुम चाहें कितना भी इस दिल को
तेरी सांसों में हम उतर जायेंगे एक दिन।

**********राजेश कुमार ’’आतिश’’**********

Wednesday, 29 July 2020

याद रखना





‘’इस तंग दिल दुनिया में मुझे छोड़ के गर जाओगे। 
याद रखना एक दिन खुद को भी तनहा पाओगे।
‘’हम तेरे दिए गम की यादों में जी लेंगे।
और तुम अपनी यादो को समेटते ही रह जाओगे।

‘’कल किसी मोड़ पे गर तुम हमसे मिल जाओगे।
याद रखना हमसे तुम नज़रे न मिला पाओगे।
‘’बीता हुआ येकल फिर लौट क ना आएगा।
और अपने किये हाल पर तुम खुद ही पछताओगे।

‘’ये बातें मेरी मज़ाक में तुम आज तो उड़ाओगे।
कल याद कर के तुम रो भी ना पाओगे।
‘’जो मुस्कुरा के गम का गीत में लिख रहा हूँ आज।
कल तुम उसे रो कर भी पड़ ना पाओगे।

‘’मेरें जाने के बाद मेरें गीतों को संजोगे।
ढूंढोगे उनमे अपने निशाँ और खुद को सताओगे।
तेरी याद बन के बोल मेरे  गीतों पर सज गये।
पर उन बोलो को तुम कभी गुनगुना ना पाओगें। 


**********राजेश कुमार ’’आतिश’’**********



Friday, 24 July 2020

हर पल तेरे साथ हूँ में।



‘’अन्जान राहों में। थामोगे वो हाथ हूँ में।
तेरे दिल का हर जज़्बात हूँ में।  
‘’बुझ ना सके जो तूफानों में। कभी
बन के लौ हर पल तेरे साथ हूँ में।  

‘’भुला ना सको वो मुलाकात हूँ में।  
तेरी जुबां से निकली हर बात हूँ में।  
‘’सजायें हैं पलकों पे तूने जो मोती
तुझे दी हुई यादों की वो सौगात हूँ में।  

‘’छुपाती हो दिल में। वो राज़ हूँ में।  
पड़ती हो तुम जो वो नमाज़ हूँ में।  
‘’मांगा हैं तुमने जिसको खुदा से
तेरे दिल से निकली वो आवाज़ हूँ में।  

‘’भिगों तुम जिसमे वो बरसात हूँ में।
हो ना सुबहा जिसकी वो रात हूँ में।  
‘’पहलु में। बेठे रहों तुम जिसके 
वो हंसी खुबसूरत कायनात हूँ में।  


**********राजेश कुमार ’’आतिश’’********** 

इस मुकद्दर से ना जाने क्यों ‘अपनी नहीं यारी हैं।



‘’इस मुकद्दर से ना जाने क्यों ‘अपनी नहीं यारी हैं।
किसी के हिस्से में शोहरतें ' किसी के हिस्से में खुमारी हैं।
‘’दिल में जगाये हैं।‘चिराग हमने भी हसरतों के जहाँ में 
दर पे तेरे शायद ‘मुराद पूरी होने की अभी नहीं मेरी बारी हैं।

‘’के इस जहाँ में फ़क्त एक में ही बेकार हूँ।
या किसी और की किस्मत भी लाचारी हैं।
‘’गुनाह हो जाऐगा शायद उस रब के हाथों
गर संवर जायेगी तकदीर जो थोड़ी सी हमारी हैं।

‘’’के सितम तकदीर के अब सहे नहीं जाते
लकीरों में उलझी हुई ये ज़िन्दगी लाचारी हैं।
‘’जिसने खाए हो सितम खुद अपने ही मुकद्दर से
उसके मुकद्दर की भी शायद गम से यारी हैं।

‘’याद नहीं वो रात जो मेने हँस के गुजारी हैं।
कटती नहीं ज़िन्दगी हर पल हमपे भारी हैं।
‘’बड़ते हैं। कदम भी डर डर आगे
लगता हैं। राहों में बिछी हर कदम पे कटारी हैं।

‘’तकदीर भी हम पे कुछ ज़यादा ही वारी हैं।
करती गुन्हा खुद हैं। हिस्से में सज़ा हमारी हैं।
‘’भूल गई हैं।तकदीर खुद शायद मुस्कुराना
इसलिए देना उसका हर पल हमपे सितम ज़ारी हैं।


‘’कहते हैं। लोग मुकद्दर रब के हाथो में हैं।
क्यूँ नहीं सुनता वो जो यह कहता फरियादी हैं।
बदलेगी किसी दिन तक़दीर भी हमारी
बस यही सोच के ये ज़िन्दगी गुजारी हैं।


**********राजेश कुमार ’’आतिश’’********** 

Friday, 17 July 2020

ना जाने क्यूँ वो गुजरा ज़माना याद आता हैं।


‘’ना जाने क्यूँ वो गुजरा ज़माना याद आता हैं।
भरी महफ़िल में भी खुद को यह दिल तन्हा पाता हैं।

‘’गुज़र रही है ज़िन्दगी ‘ये मेरी कुछ इस तरहा
की अब गम नहीं ख़ुशी का डर सताता हैं।

‘’के पूछता हूँ ये अक्सर में खुद से
क्या बन गया हूँ और दिल क्या बनना चाहता हैं।

‘’हटती नहीं नज़र ‘तेरी तस्वीर से मेरी
हर नज़र में मुझे बस तू ही नज़र आता हैं।

‘’ज़िन्दगी में छा गई हैं।ख़ामोशी इस कदर
की हर आहट पर अब ज़ी घबराता हैं।


................‘’ना जाने क्यूँ वो गुजरा ज़माना याद आता हैं।

**********राजेश कुमार ’’आतिश’’********** 



Thursday, 16 July 2020

ख्हाबों खयालो में तुझको बिठाया हैं।




‘’ख्हाबों खयालो में तुझको बिठाया हैं।
हर घडी हर पल तू नज़र आया हैं।
‘’तुझे चाहने की हंसी भूल की हैं।
ज़िन्दगी का सपना तेरे संग सजाया हैं।

‘’तुझे प्यार करता हूँ कितना ‘बताऊँ क्या
मेरी ज़िन्दगी को अनमोल तूने बनाया हैं।
‘’दरबदर में फिरता रहता था ‘यहाँ
बदल गई ज़िन्दगी में ‘जबसे तू आया हैं।

‘’नज़र बंद कर के भी दिखती हैं। हर जगह
उदासी की नींद से जो तूने जगाया हैं।
‘’काँटों में उलझी हुई थी यह ज़िन्दगी
फूलो की खुशबु से तूने महकाया हैं।

‘’संवर गई हैं। दुनिया मेरी कुछ इस तरहा
नज़र लगने के डर से इसको छुपाया हैं।
‘’बस गया हैं। तेरा प्यार मेरी सांसों में
इस दिल को धडकना तूने सिखाया हैं।

‘’गिर ना जाये तेरी आँखों से आंसू कभी
इस कोशिश में ज़िन्दगी का हर पल लगाया हैं।
‘’खो गया हूँ तेरे आगोश में अब
जिस्म तेरा मुझमे सिमट के जो आया हैं।

‘’मुस्कुराती हैं। सुबहा हर रात जगमगाती हैं।
तारो की झिलमिलाहट में भी चाँद नज़र आया हैं।
‘’रोशन हो गई ज़िन्दगी अब इस तरहा
जबसे चाहत का दिया इस दिल में तुमने जलाया हैं।

‘’हो ना जाना मुझसे दूर कभी
बीन तेरे ज़िन्दगी बस एक काला साया हैं।
‘’मर जाऊँगा में उसी पल ‘अगर
कभी ‘तुझको को जुदा मेने खुद से पाया हैं।

‘’ना कर फ़िक्र इस ज़माने की
हमे तो खुद उस रब ने मिलाया हैं।
‘’क्या सोचती हैं अगले जन्म का
हमने तो हर गुज़रा जन्म साथ बिताया हैं।

**********राजेश कुमार ’’आतिश’’********** 

Saturday, 11 July 2020

एक बच्चा जो सड़क किनारे तिरंगा झंडा बेच रहा था

कविता में उस  मार्मिक दर्द  को  व्यंग रूप में चंद पंक्तियों में व्यक्त किया हैं 


एक बच्चा जो सड़क किनारे तिरंगा झंडा बेच रहा था
और आने जाने वाले हर लोगो को अपनी और खेंच रहा था
5 रूपए में झंडा लेने की आवाज़ लगा रहा था
और आती जाती गाड़ियों की तरफ दौड़ के भी जा रहा था

एक महाशय ने झंडा लिया पर 10र० के तीन देने का आग्रह किया
बच्चा बोला == बाबु साहब आप गैरत वाले नज़र आते हो 
क्यूँ देश के मान का दाम कम लगते हो
बाबु साहब इस तिरंगे पर देश का मान सम्मान टिका हैं

और कुछ ही दिन पहले 
यही झंडा नेताजी की सभा में 10 रु में एक बिका हैं
बाबु साहब बोले = बेटा इस महंगाई ने हर तरफ से मारा है
इसलिए झंडा खरीदने के लिए भी सोचता यह आम आदमी बेचारा हैं
बेटा नेताजी सो नहीं हज़ार में भी झंडा खरीद सकते हैं 
क्यों की वो हर पल हमारे टेक्स के पैसे चरते हैं
और हम अपना पसीना बहा के ज़िन्दगी गुज़र बसर करते हैं

नहीं मिलता यहाँ आम आदमी को डंडे का भी सहारा हैं
इसलिए झंडा खरीदने के लिए सोचता यह आम आदमी बेचारा हैं  

**********राजेश कुमार ’’आतिश’’**********